दिल्ली फायर सर्विस का 57 साल पुराना संचार ढांचा उजागर, आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू

दिल्ली फायर सर्विस 57 साल पुराने संचार ढांचे और बड़ी संख्या में खाली पदों जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, जिससे आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रभावित हो रही है।

नई दिल्ली। हौजरानी अग्निकांड के बाद दिल्ली फायर सर्विस (डीएफएस) की कार्यप्रणाली और संसाधनों की व्यापक समीक्षा में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। राजधानी में आग जैसी आपात स्थितियों से निपटने वाली प्रमुख एजेंसी आज भी 57 वर्ष पुराने संचार ढांचे के सहारे काम कर रही है, जबकि दिल्ली का भौगोलिक विस्तार, आबादी और बहुमंजिला इमारतों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है।
दिल्ली के गृह मंत्री अशिष सूद की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में फायर सर्विस की तैयारियों और संचार नेटवर्क की प्रभावशीलता का आकलन किया गया। बैठक में अधिकारियों ने बताया कि डीएफएस का वायरलेस नेटवर्क वर्ष 1969 में केवल 17 फायर स्टेशनों के लिए दो वीएचएफ चैनलों—148.525 मेगाहर्ट्ज और 148.725 मेगाहर्ट्ज—पर शुरू किया गया था। वर्तमान में दिल्ली में 71 फायर स्टेशन संचालित हैं, लेकिन संचार प्रणाली की बुनियादी संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है।
हालांकि समय के साथ वायरलेस उपकरणों को आधुनिक बनाया गया है और वर्तमान में डिजिटल मोबाइल रेडियो सेटों का उपयोग हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा नेटवर्क तेजी से विकसित हुई दिल्ली की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है।
सूत्रों के अनुसार विभाग में स्वीकृत पदों के मुकाबले एक चौथाई से अधिक फायर फाइटर पद खाली हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 3,312 स्वीकृत पदों में से 853 पद रिक्त हैं। इसके अलावा स्टेशन अधिकारी के 90 स्वीकृत पदों में से केवल 18 पर ही नियुक्तियां हैं। बताया गया कि इस पद के लिए अंतिम प्रत्यक्ष भर्ती वर्ष 2011 में हुई थी।
समीक्षा में यह भी सामने आया कि वीएचएफ आधारित संचार व्यवस्था ‘लाइन ऑफ साइट’ तकनीक पर निर्भर करती है, जिसके तहत रेडियो संकेतों के सुचारु आदान-प्रदान के लिए दोनों बिंदुओं के बीच स्पष्ट मार्ग होना आवश्यक होता है। दिल्ली जैसे घने शहरी क्षेत्र में ऊंची इमारतें, बेसमेंट और भूमिगत संरचनाएं संकेतों को बाधित करती हैं, जिससे नियंत्रण कक्ष और घटनास्थल के बीच संचार प्रभावित हो सकता है।
अधिकारियों का कहना है कि आपदा की स्थिति में संचार में आने वाली यह बाधा राहत एवं बचाव कार्यों की गति को प्रभावित कर सकती है। हाल के वर्षों में बढ़ती अग्नि दुर्घटनाओं और जनहानि को देखते हुए संचार व्यवस्था को आधुनिक बनाने की आवश्यकता महसूस की गई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019-20 में आग की घटनाओं में 100 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2025-26 में भी 84 लोगों की जान गई। यह स्थिति फायर सर्विस की क्षमता बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित करती है।
गृह मंत्री अशिष सूद ने कहा कि फायर सर्विस के व्यापक आधुनिकीकरण की दिशा में प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और इसके लिए टेंडर जारी किए जा चुके हैं। नई प्रणाली के तहत जीपीएस, जीआईएस और निगरानी कैमरों को एकीकृत किया जाएगा, जिससे फायर टेंडरों की रीयल टाइम लोकेशन पर नजर रखी जा सकेगी और किसी भी घटना की सूचना मिलते ही निकटतम वाहन को तुरंत रवाना किया जा सकेगा। साथ ही ट्रैफिक की स्थिति के अनुसार सबसे तेज मार्ग का चयन भी संभव होगा।
अधिकारियों का दावा है कि उन्नत संचार नेटवर्क बहुमंजिला इमारतों और जटिल संरचनाओं में भी प्रभावी ढंग से कार्य करेगा। बिजली आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भी संचार व्यवस्था चालू रहेगी, जिससे आपातकालीन सेवाओं की प्रतिक्रिया क्षमता में उल्लेखनीय सुधार आएगा।

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