दिल्ली में फुटपाथ अतिक्रमण से बदहाल हालात, चार साल में 2524 राहगीरों की मौत

नई दिल्ली/एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फुटपाथ को आम लोगों का मौलिक अधिकार बताए जाने के बावजूद राजधानी दिल्ली में फुटपाथ अतिक्रमण की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। प्रशासन द्वारा हर साल अतिक्रमण हटाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में कोई ठोस सुधार दिखाई नहीं देता। आंकड़ों के अनुसार, बीते चार वर्षों में फुटपाथों के अभाव और अतिक्रमण के कारण 2524 राहगीरों की जान जा चुकी है। फुटपाथों पर अवैध दुकानों, रेहड़ी-पटरी, यहां तक कि पुलिस बूथ और मोहल्ला क्लीनिक जैसे निर्माणों के कारण पैदल चलने वालों के लिए जगह नहीं बचती। मजबूरी में लोग सड़क पर चलते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
स्पेशल टास्क फोर्स के आंकड़ों के मुताबिक, एमसीडी ने वर्ष 2026 में 828 वर्ग किलोमीटर, 2025 में 2000.20 वर्ग किलोमीटर और 2024 में 5030.95 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाने का दावा किया है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं नजर नहीं आता। अतिक्रमण हटाने के कुछ घंटों बाद ही स्थिति फिर से पहले जैसी हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अतिक्रमण अब ‘वोट बैंक’ का रूप ले चुका है, जिसके चलते राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती। यही कारण है कि पिछले एक दशक में यह समस्या और विकराल हो गई है।
राजधानी के कई प्रमुख इलाके इस समस्या से जूझ रहे हैं। मध्य दिल्ली में करोल बाग, राजेंद्र नगर, चांदनी चौक, सदर बाजार और नेताजी सुभाष मार्ग पर फुटपाथ अतिक्रमण की चपेट में हैं। यमुनापार क्षेत्र में आनंद विहार बस अड्डे के आसपास सैकड़ों अवैध रेहड़ी-पटरी लगती हैं, जबकि कृष्णा नगर और गीता कॉलोनी में फुटपाथों पर सेकेंड हैंड बाइक की दुकानें संचालित हो रही हैं।
इसके अलावा गांधी नगर, ब्रह्मपुरी, भजनपुरा, छज्जूपुर, साकेत, गोविंदपुरी, कालकाजी, आजादपुर, नांगलोई, नरेला, उत्तम नगर, पालम और द्वारका जैसे इलाकों में भी फुटपाथ अतिक्रमण आम बात है। इन क्षेत्रों में लोग पैदल चलने के बजाय सड़कों पर चलने को मजबूर हैं, जिससे दुर्घटनाओं और जाम की समस्या बढ़ रही है। लगातार शिकायतों के बावजूद संबंधित एजेंसियों—दिल्ली पुलिस, एमसीडी, डीडीए और पीडब्ल्यूडी—द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

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