तिहाड़ जेल प्रशासन का बड़ा फैसला, कैदियों के सर्टिफिकेट से हटेगा ‘जेल’ शब्द

तिहाड़ जेल प्रशासन ने कैदियों के व्यावसायिक कोर्स सर्टिफिकेट से 'जेल' शब्द और पदनाम हटाने का फैसला किया है। यह कदम सजा पूरी करने के बाद कैदियों को रोजगार के समान अवसर देने और समाज में उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

पश्चिमी दिल्ली। देश की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ में बंद कैदियों के पुनर्वास को ध्यान में रखते हुए जेल प्रशासन ने एक अहम और संवेदनशील निर्णय लिया है। अब जेल के भीतर कैदियों द्वारा किए जाने वाले व्यावसायिक कोर्स के सर्टिफिकेट पर ‘जेल’ शब्द, स्थान या उससे जुड़े किसी भी पदनाम का उल्लेख नहीं किया जाएगा। इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य सजा पूरी करने के बाद बाहर आने वाले व्यक्तियों को रोजगार के समान अवसर उपलब्ध कराना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापित करना है।
अब तक की व्यवस्था के अनुसार, कैदी जेल में रहकर कंप्यूटर, सिलाई, कारपेंटरी, बेकिंग और पेंटिंग जैसे विभिन्न व्यावसायिक कोर्स पूरा करते थे, जिनके सर्टिफिकेट पर केंद्रीय कारागार की मुहर, जेल अधीक्षक के हस्ताक्षर और पदनाम स्पष्ट रूप से अंकित होते थे। इससे नौकरी की तलाश के दौरान उनका अतीत उजागर हो जाता था और कई बार योग्यता होने के बावजूद उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता था।
नई व्यवस्था के तहत सर्टिफिकेट के प्रारूप में व्यापक बदलाव किया गया है। अब सर्टिफिकेट पर संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर और नाम तो होंगे, लेकिन उनका पदनाम या जेल से जुड़ी कोई पहचान प्रदर्शित नहीं की जाएगी। साथ ही सर्टिफिकेट पर जेल का पता या नाम भी अंकित नहीं होगा, जिससे कैदियों की पहचान गोपनीय बनी रहे।
जेलों में शिक्षा के प्रति बढ़ते रुझान के बीच यह फैसला और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तिहाड़, रोहिणी और मंडोली जेलों में हर वर्ष 1,500 से 2,000 कैदी 10वीं, 12वीं, स्नातक, परास्नातक और विभिन्न डिप्लोमा कोर्स में दाखिला ले रहे हैं। इसके अलावा ‘फूड एंड न्यूट्रिशन’, ‘ह्यूमन राइट्स’ और ‘साइबर लॉ’ जैसे आधुनिक विषयों में भी कैदी रुचि दिखा रहे हैं।
जेल परिसर में स्थापित अध्ययन केंद्रों के माध्यम से हर साल 700 से 800 कैदी नियमित परीक्षाओं में शामिल होकर डिग्रियां हासिल कर रहे हैं। चूंकि भारत में जेल ‘राज्य सूची’ का विषय है, इसलिए विभिन्न राज्यों में नियम अलग-अलग हैं। हालांकि जेल प्रशासन द्वारा स्वयं जारी किए जाने वाले व्यावसायिक सर्टिफिकेट्स में इस प्रकार का बदलाव पहली बार किया गया है।
जेल महानिदेशक आनंद मोहन ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य कैदियों के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव को समाप्त करना है। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था से कैदी बिना किसी हीन भावना के अपने कौशल के आधार पर समाज में नई शुरुआत कर सकेंगे।
वहीं जेल सुधार से जुड़ी ‘तिनका तिनका’ श्रृंखला की लेखिका वर्तिका नंदा का कहना है कि समाज और कंपनियां अक्सर किसी व्यक्ति के अतीत के आधार पर उसे अवसर देने से हिचकिचाती हैं। सर्टिफिकेट से जेल का नाम हटने के बाद अब इन लोगों को उनकी योग्यता और हुनर के आधार पर रोजगार मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी।

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