दक्षिणी दिल्ली में बेघरों की बढ़ती संख्या, रैन बसेरों के अभाव में सड़क किनारे जिंदगी गुजारने को मजबूर
दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर में 40 से अधिक बेघर परिवार फुटपाथ पर जीवनयापन कर रहे हैं, जो लाल बत्ती पर सामान बेचकर गुजारा करते हैं। इलाके में रैन बसेरों की कमी और असुरक्षित अस्थाई शेल्टरों के कारण ये परिवार गंभीर खतरों का सामना करते हैं, जैसा कि हाल ही में हुई बच्ची के अपहरण की घटना से उजागर हुआ है।

दक्षिणी दिल्ली। महरौली-गुरुग्राम रोड पर कुतुब मीनार मेट्रो स्टेशन से आगे बढ़ते ही सड़क किनारे बेघर परिवारों का जमावड़ा देखने को मिलता है। रेड लाइट पर करतब दिखाकर या गुलदस्ते व खिलौने बेचकर जीवन यापन करने वाले ये लोग अधिकतर राजस्थान से आए घुमंतू परिवार हैं। क्षेत्र में रैन बसेरों की कमी के चलते ये परिवार जहां भी छांव मिलती है, वहीं अस्थायी डेरा डाल लेते हैं।
छतरपुर 100 फुटा रोड मोड़ की लाल बत्ती, अंधेरिया मोड़, सीडीआर चौक, छतरपुर मेट्रो स्टेशन के नीचे और मुख्य छतरपुर रोड पर मंदिरों के आसपास करीब 40 परिवार निवास कर रहे हैं। इनकी आजीविका पूरी तरह ट्रैफिक सिग्नलों पर निर्भर है। लाल बत्ती पर गाड़ियों के डेढ़ से दो मिनट रुकने के दौरान ही ये लोग अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करते हैं।
इस मार्ग पर गुरुग्राम से आने-जाने वाले वाहनों की आवाजाही देर रात तक बनी रहती है, जिसके चलते रात में भी इन परिवारों का काम जारी रहता है। हालांकि प्रशासन द्वारा इन्हें कई बार हटाया गया, लेकिन छतरपुर, मांडी, जौनापुर और सुल्तानपुर सहित आसपास के इलाकों में पर्याप्त रैन बसेरों की व्यवस्था न होने के कारण ये लोग पुनः लौट आते हैं।
छतरपुर 100 फुटा रोड के पास एसएसएन मार्ग पर एक अस्थायी शेल्टर मौजूद है, लेकिन उसकी स्थिति अत्यंत खराब है। वहां असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का जमावड़ा रहता है, जिससे परिवारों की सुरक्षा को खतरा बना रहता है। इसी कारण अधिकांश बेघर परिवार वहां शरण लेने से बचते हैं।
हाल ही में छतरपुर 100 फुटा रोड की लाल बत्ती के पास हुई एक बच्ची के अपहरण की घटना ने इन परिवारों की असुरक्षा को उजागर कर दिया। घटना स्थल पर पीड़ित परिवार के अलावा कोई अन्य बेघर परिवार नहीं रहता था, जिसका फायदा आरोपित ने उठाया।
पीड़ित परिवार पहले इसी क्षेत्र में किराए के मकान में रहता था, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण अपने गांव (छपरा) लौट गया था। चार महीने बाद आजीविका की तलाश में डेढ़ महीने पहले फिर दिल्ली आया, पर इस बार उन्हें किराए का कमरा नहीं मिला। माता-पिता फुटपाथ के पास दुकानों में आने वाले सामान को ट्रकों से उतारने का काम करते हैं, जबकि बच्चे पास के राधा-कृष्ण मंदिर के आसपास रहते हैं। रात में पूरा परिवार फुटपाथ पर ही सो जाता था, जहां माता-पिता बच्चों को अपने बीच सुलाकर उनकी सुरक्षा का ध्यान रखते थे। बावजूद इसके, आरोपित ने मौके का फायदा उठाकर बच्ची का अपहरण कर लिया।
यह स्थिति न केवल बेघरों की बदहाल जीवनशैली को दर्शाती है, बल्कि राजधानी में सुरक्षित और पर्याप्त रैन बसेरों की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।




