दिल्ली की सभी जिला अदालतों में वकीलों की हड़ताल
राजधानी दिल्ली की सभी सात जिला अदालतों में वकील अपनी दो मुख्य मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं।

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के सभी जिला अदालतों में बृहस्पतिवार को वकील हड़ताल पर हैं। दिल्ली में कुल सात जिला अदालतें हैं—साकेत, पटियाला हाउस कोर्ट, राउज एवेन्यू, कड़कड़डूमा, तीस हजारी, द्वारका और रोहिणी। इन सभी में आज वकील अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं। इन अदालतों में हजारों वकील प्रैक्टिस करते हैं और लाखों केस पेंडिंग हैं। वकीलों का कहना है कि हड़ताल दो मुख्य मुद्दों को लेकर की गई है।
दो मुख्य मुद्दे
1. सिविल मामलों का आर्थिक क्षेत्राधिकार बढ़ाने की मांग
वर्तमान में दिल्ली की जिला अदालतों में वही सिविल मुकदमे दाखिल किए जा सकते हैं जिन संपत्तियों की कीमत दो करोड़ रुपये तक है। इससे अधिक मूल्य के मामलों को केवल दिल्ली हाईकोर्ट में ही दाखिल किया जा सकता है। यह सीमा पहले बीस लाख रुपये थी, जिसे 26 अक्टूबर 2015 को बढ़ाकर दो करोड़ रुपये किया गया था। लगभग ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं और इस अवधि में दिल्ली में संपत्तियों के मूल्य कई गुना बढ़ चुके हैं। वकीलों का कहना है कि इसलिए हमारी मांग है कि यह सीमा दो करोड़ से बढ़ाकर बीस करोड़ रुपये की जाए, ताकि बीस करोड़ तक के दीवानी मुकदमे जिला अदालतों में ही दाखिल हो सकें।
2. हाईकोर्ट के निर्णयों में जिला अदालत प्रतिनिधियों की भागीदारी
जब भी दिल्ली हाईकोर्ट वकीलों से संबंधित कोई निर्णय लेती है, चैंबर निर्माण, कोर्ट रूम विस्तार, लाइब्रेरी सुविधाएं या अन्य व्यवस्थाएं- तो जिला अदालतों के चुने हुए प्रतिनिधियों को भी इसमें सम्मिलित किया जाना चाहिए। हाल के समय में यह देखा गया है कि जिला अदालतों के प्रतिनिधियों को इन निर्णयों की जानकारी तक नहीं दी जाती, न ही उनसे कोई राय ली जाती है। यह स्थिति उचित नहीं है और इसमें सुधार आवश्यक है। वक्ताओं ने कहा कि ये मांगें केवल वकीलों के लिए ही नहीं, बल्कि उन लाखों लिटिगेंट्स के लिए भी हैं जो ‘न्याय आपके द्वार’ की उम्मीद के साथ अदालतों में आते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट पर पहले ही मुकदमों का अत्यधिक बोझ है, जिसके कारण कई बार सुनवाई की तारीखें बढ़ती रहती हैं और मामलों में देरी होती है। वहीं जिला अदालतों में आज पर्याप्त न्यायिक अधिकारी, कोर्टरूम और आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिससे मामलों का निपटारा अधिक आसानी से हो सकता है। ‘जस्टिस एट डोरस्टेप’ की भावना तभी सार्थक होगी जब बीस करोड़ रुपये तक के दीवानी मुकदमे जिला अदालतों में ही दाखिल किए जाएं।




