क्लीनिक और अस्पतालों को बड़ी राहत: छोटी चूक पर अब नहीं जाना पड़ेगा जेल, भरना होगा दंड

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट (पंजीकरण एवं विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन कर छोटी प्रक्रियागत चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। अब ऐसे मामलों में जेल की सजा नहीं होगी, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर दंड लगाया जाएगा।

नई दिल्ली। अस्पतालों और क्लीनिकों को बड़ी राहत देते हुए केंद्र सरकार ने क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट (पंजीकरण एवं विनियमन) अधिनियम, 2010 में महत्वपूर्ण संशोधन किया है। नए प्रावधानों के तहत अब छोटी प्रक्रियागत चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। ऐसे मामलों में जेल की सजा नहीं होगी, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर दंड लगाया जाएगा।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 22 जून को घोषित यह बदलाव जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) अधिनियम, 2026 के तहत किया गया है। इसका उद्देश्य मामूली प्रक्रियागत कमियों को अपराध की श्रेणी से हटाकर भरोसे पर आधारित शासन प्रणाली को बढ़ावा देना है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह संशोधन केवल छोटी प्रक्रियागत चूकों तक सीमित है। मरीजों की सुरक्षा, उपचार की गुणवत्ता और जवाबदेही से जुड़े नियमों में कोई ढील नहीं दी गई है। सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद दंडात्मक व्यवस्था को संतुलित बनाना है, न कि निगरानी प्रणाली को कमजोर करना।
अधिकारियों के अनुसार, पहले कई अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को रिकॉर्ड, दस्तावेज या अन्य प्रक्रियागत कमियों के कारण कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता था, जबकि इनका मरीजों की सुरक्षा या उपचार की गुणवत्ता से सीधा संबंध नहीं होता था। नए नियम लागू होने के बाद अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी, अनुपालन का दबाव घटेगा और नियामकीय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी व सरल बनेगी। साथ ही, स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यवसाय करना भी आसान होगा।
हालांकि, इस संशोधन को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि “मामूली चूक” (माइनर डिफिशिएंसी) की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे व्याख्या को लेकर भ्रम की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं है कि मरीज को तत्काल खतरे की स्थिति का निर्धारण कौन करेगा, अदालत की जगह किस अधिकारी को निर्णय का अधिकार होगा और बार-बार उल्लंघन करने वाले संस्थानों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।
इन सवालों के जवाब स्पष्ट न होने से नीति के क्रियान्वयन को लेकर असमंजस बना हुआ है, हालांकि सरकार इसे स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रही है।

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