ओडिशा से प्रोटेस्ट में जंतर-मंतर पहुंची कैंसर पीड़ित महिला, बेहोश होकर गिर पड़ीं

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में एक महिला ओडिशा से दिल्ली पहुंची। कैंसर और किडनी की बीमारी के बाद भी महिला अपने बेटे के साथ जंतर-मंतर आई हैं। उन्होंने कहा है कि उनका प्रदर्शन में शामिल होना औरों के लिए संदेश है।

नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध प्रदर्शन तीसरे दिन भी जारी रहा, जहां प्रदर्शनकारियों की कई भावुक कहानियां सामने आई हैं। इनमें ओडिशा से आई एक गंभीर रूप से बीमार महिला की कहानी ने सभी का ध्यान खींचा है, जो अपने बेटे के साथ करीब 1200 किलोमीटर की यात्रा कर प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचीं। ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के कोइडा की रहने वाली बबीतांजलि, जो लिवर कैंसर और किडनी फेलियर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रही हैं, अपने बेटे के साथ दिल्ली पहुंचीं। उनके हाथ में मेडिकल ड्रेनेज बैग था और उन्होंने जंतर-मंतर पर फुटपाथ किनारे ही अपना सामान रखकर प्रदर्शन में भाग लिया। उनका इलाज मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में चल रहा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सामाजिक मुद्दे को लेकर चल रहे विरोध में शामिल होने का निर्णय लिया।
शनिवार को दिल्ली पहुंचने के बाद थोड़े आराम के उपरांत वह रात में ही धरने में शामिल हो गईं। हालांकि लंबी यात्रा और खराब स्वास्थ्य के कारण उनकी स्थिति बिगड़ गई और खाने-पीने की दिक्कतों के बीच वह फुटपाथ पर बेहोश हो गईं। मौके पर मौजूद अन्य प्रदर्शनकारियों और स्वयंसेवकों ने उन्हें दवाइयां और भोजन उपलब्ध कराकर उनकी हालत को स्थिर किया।
रविवार सुबह उन्होंने कहा कि वह अब बेहतर महसूस कर रही हैं और उनका मनोबल अभी भी मजबूत है। बबीतांजलि ने कहा कि बचपन से ही उन्हें लोगों की मदद करना पसंद रहा है और वह देशभर के छात्रों के भविष्य को लेकर इस आंदोलन में शामिल हुई हैं। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के प्रति निराशा जताते हुए मौजूदा हालात को संस्थागत विफलता बताया।
उन्होंने कहा कि उनका इस विरोध में शामिल होने का कोई व्यक्तिगत उद्देश्य नहीं है, बल्कि वह एक मां के रूप में अन्य अभिभावकों को प्रेरित करना चाहती हैं। उनका कहना था कि यदि वह अपनी गंभीर बीमारी के बावजूद इस आंदोलन का हिस्सा बन सकती हैं, तो अन्य लोग भी आगे आ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपनी जान की परवाह नहीं है और यदि जरूरत पड़ी तो वह छात्रों के भविष्य के लिए आखिरी सांस तक संघर्ष करती रहेंगी।

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