अंधविश्‍वास पर कटाक्ष करती है ‘डुग डुग’, क्लाइमैक्स है शॉकिंग

सच्ची घटना पर आधारित फिल्म 'डुग डुग' अंधविश्वास, आस्था और उसके व्यवसायीकरण पर तीखा कटाक्ष करती है।

एंटरटेनमेंट डेस्क/मुंबई। सच्‍ची घटना से प्रेरित फिल्‍म डुग डुग सीमित बजट में बनी फिल्म है। इसमें न कोई बड़ा सितारा है और न ही चकाचौंध से भरा सिनेमाई पैमाना, इसके बावजूद यह फिल्म अंधविश्वास, आस्था और उसके कारोबार पर तीखा कटाक्ष करती है। अगर पटकथा पर थोड़ी और गहराई से काम किया जाता, तो यह फिल्म कहीं ज्यादा असरदार बन सकती थी। कहानी राजस्‍थान के छोटे से कस्‍बे की है। नशे में द्युत ठाकुर (अल्‍ताफ खान) जर्जर मोपेड से दुर्गम रास्‍तों पर किसी हीरो की तरह निकलता है। सूनसान रास्‍ते से गुजरने के दौरान एक्‍सीडेंट में उसकी दर्दनाक मौत हो जाती है। उसकी मोपेड को पुलिसकर्मी मनफुल (दुर्गा लाल सैनी), प्‍यारे लाल (गौरव सोनी) ओर बद्री (योगेंद्र सिंह परमार) पुलिस चौकी लेकर आते हैं।
अगले दिन वह मोपेड गायब होती है और उसी जगह मिलती है जहां दुर्घटना हुई होती है। वहां पर प्रख्‍यात जादूगर पीसी शर्मा का पोस्‍टर भी लगा होता है। मोपेड को वापस लाकर पेट्रोल निकाल कर ताले में बांधा जाता है। उसके बावजूद अगली सुबह मोपेड दुर्घटना स्‍थल पर मिलती है। फिर चौकी के अंदर ताले और जंजीरों में बांधा जाता है। पर फिर सुबह वहीं खड़ी मिलती है। इसे लोग चमत्‍कार मानने लगते हैं।
अंधविश्वास पर कटाक्ष करती है फिल्म
मोपेड को एक चबूतरे पर रखकर मंदिर जैसा श्रद्धास्थल बना दिया जाता है। बड़े पंडित ठाकुर को भगवान का दूत घोषित कर देते हैं और उनकी पसंद की चीजें चढ़ावे में चढ़ाने की सलाह देते हैं। लोगों की मन्‍नतें पूरी होने की कहानियां भी फैलने लगती हैं। समय बीतने के साथ अंधविश्वास का यह रोमांच आस्था के कारोबार में बदल जाता है। पुजारी, स्‍थानीय नेता, भक्त और अमीर राजघराने तक इस कहानी का हिस्सा बन जाते हैं, लेकिन संतान हीन प्‍यारेलाल वहां नहीं जाता। यह वजह फिल्‍म देखने पर पता चलेगी।
सच्ची घटनाओं से प्रेरित है फिल्म
कई प्रतिष्ठित फिल्‍म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने के करीब पांच साल बाद फिल्‍म डुग डुग शुक्रवार (आठ मई) को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। डुग डुग राजस्थान के पाली-जोधपुर हाईवे पर मौजूद प्रसिद्ध ‘बुलेट बाबा मंदिर’ की विरासत से प्रेरित है। पहली बार निर्देशन कर रहे रित्विक पारेख ने अंधविश्वास पर आधारित एक छोटे से घटनाक्रम को व्यंग्यात्मक अंदाज में दिखाने की अच्‍छी कोशिश की है।
बार-बार जादूगर के होर्डिंग पर कैमरे का जाना, लोगों की आंखों में चमत्कार खोजने की बेचैनी और घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की सामाजिक प्रवृत्ति को निर्देशक ने बखूबी दिखाया है। गुब्बारे वाले का वह दृश्य, जिसे वह फुलाता जा रहा है और फूटता नहीं या फिर ठाकुर सा के परिचित का मीडिया के सामने उन्हें धार्मिक इंसान बताना ये सब दृश्य समाज की मानसिकता पर तीखी टिप्पणी करते हैं।
फिल्म यह भी दिखाती है कि किस तरह लोग किसी साधारण घटना को धीरे-धीरे मिथक और आस्था में बदल देते हैं। हालांकि मोपेड की ख्‍याति के बाद कहानी में कुछ ट्विस्‍ट और टर्न डालकर इसे बेहतर करने की संभावना थी। ठाकुर सा के अतीत के बारे में कोई बात नहीं है कि वो कैसा इंसान था? पुलिसकर्मियों का रहस्‍य चौंकाता है, लेकिन उसे सपाट तरीके से दर्शा दिया गया है जबकि वही कहानी का सबसे अहम पहलू है।
सिनेमैटोग्राफर आदित्‍य एस कुमार का ग्रामीण परिवेश को प्रभावशाली तरीके से कैमरे में कैद किया है। गीत संगीत में स्‍थानीयता का पुट कहानी साथ सुसंगत है। पुलिसकर्मियों की भूमिका में गौरव सोनी, योगेंद्र सिंह परमार और दुर्गा लाल सैनी का काम सराहनीय है। कुल मिलाकर फिल्म दिखाती है कि विश्वास सिर्फ अज्ञानता से नहीं, बल्कि उम्मीद, मजबूरी और परिस्थितियों से भी पैदा होता है।

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